भारतीय पर्वतारोहियों ने पीर पंजाल रेंज में गुप्त पर्वत को फतह किया

कोलकाता :पश्चिम बंगाल के नौ पर्वतारोहियों की एक टीम ने मंगलवार को हिमाचल प्रदेश के लाहौल और स्पीति जिले के पीर पंजाल रेंज में 5,988 मीटर की ऊंचाई पर स्थित एक चोटी ‘गुप्त पर्वत’ को फतह किया। इस चोटी पर इससे पहले कोई भी पर्वतारोही पहुंचने में सफल नहीं हुआ था। पर्वतारोहण टीम के क्लब ने यह जानकारी दी।

पर्वतारोहियों ने बताया कि इस पर्वत का नाम इसकी विशिष्ट भौगोलिक स्थिति के कारण पड़ा है। यह चोटी हिमालय पर्वतमाला की अन्य चोटियों के बीच अदृश्य है, जिसके कारण इसकी तस्वीर लेना भी लगभग असंभव है।

कोलकाता के दक्षिण में बाहरी इलाके सोनारपुर में स्थित पर्वतारोहियों के क्लब सोनारपुर आरोही द्वारा संचालित तथा पर्वतारोही रूद्र प्रसाद हलदर के नेतृत्व में टीम लगभग आठ घंटे की चढ़ाई के बाद सुबह करीब 8.45 बजे गुप्त पर्वत की चोटी पर पहुंची।

इस टीम में विश्व के सबसे युवा पर्वतारोही और प्रत्येक महाद्वीप की सात चोटियों तथा सात ज्वालामुखी चोटियों पर चढ़ने वाले भारत के पहले शख्स सत्यरूप सिद्धांत शामिल थे तथा इसमें एक महिला सदस्य दीपोश्री पॉल भी शामिल थीं।

यह टीम तीन जून को कोलकाता से माउंट शिकार बेह (6,200 मीटर) और गुप्त पर्वत की चोटी पर चढ़ने के दोहरे लक्ष्य के साथ रवाना हुई थी, लेकिन पता चला कि जब पर्वतारोही चोटी पर जाने के लिए रास्ता बनाने में सफल हो गए, तभी हिमस्खलन के कारण महत्वपूर्ण चढ़ाई उपकरण नष्ट हो गए, जिसके कारण उन्हें शिखर पर चढ़ने की उम्मीद छोड़नी पड़ी।

इसके बाद टीम ने गुप्त पर्वत को फतह करने पर ध्यान केंद्रित किया। पर्वतारोहण सहायता दल के सदस्य दीपांजन दास ने बताया, ‘‘टीम ने 5,285 मीटर की ऊंचाई पर शिविर स्थापित किया और पर्वत के पश्चिमी हिस्से के माध्यम से चोटी तक पहुंचने की योजना बनाई। पिछले तीन दिन से लगातार बर्फबारी के कारण पर्वतारोही चोटी तक पहुंचने के लिए समय का इंतजार कर रहे थे। आखिरकार उन्होंने 25 जून को तड़के एक बजे शिखर पर चढ़ने की योजना बनाई।’’

अंतिम सूचना मिलने तक, पर्वतारोही सफलतापूर्वक शिविर तक उतर चुके थे और आगे शिविर-एक की ओर जाने की योजना बना रहे थे।

सत्यरूप की मां गायत्री सिद्धांता (70) ने कहा, ‘‘इसमें कोई संदेह नहीं है कि मैं आज उन सबकी उपलब्धि से खुश हूं। लेकिन उससे भी अधिक, मुझे इस बात से बहुत राहत मिली है कि चोटियों पर कई मुश्किलों का सामना करने के बावजूद टीम के सभी सदस्य सुरक्षित हैं।’’

क्लब की वेबसाइट पर बताया गया है कि सोनारपुर आरोही क्लब के सदस्यों की उपलब्धियों में माउंट एवरेस्ट पर उसके उत्तर और दक्षिण दोनों तरफ से चढ़ाई, पूर्वी भारत में माउंट कंचनजंघा पर चढ़ाई से लेकर पश्चिमी क्षेत्र में कच्छ के रण, ट्रांस-हिमालयी साइकिलिंग अभियान और अफ्रीका में माउंट किलिमंजारो की चोटी तक साइकिलिंग अभियान शामिल हैं।

Laungi Bhuiyan: দশরথের পথে ৩০ বছর ধরে একা খাল কেটে গ্রামে জল আনলেন লোঙ্গি ভুঁইয়া

Laungi Bhuiyan

বিশেষ প্রতিবেদন: বিহারের দশরথ মাঝির কথা গোটা বিশ্ব জানে। দশরথের মতোই অসাধ্য সাধন করেছেন বিহারের গয়ার কোঠিওয়ালা (Kothiwala village) গ্রামের লোঙ্গি ভুঁইয়া (Laungi Bhuiyan)। গয়া থেকে ৮০ কিলোমিটার দূরে পাহাড়-জঙ্গল দিয়ে ঘেরা এক গ্রাম কোঠিওয়ালা।

কিন্তু এই গ্রামে সবকিছু থাকলেও ছিল না জল। পর্যাপ্ত জলের (watet) অভাবে গ্রামবাসীদের (villagers) সমস্যার অন্ত ছিল না। একটু পানীয় জলের জন্য গ্রামের মেয়ে বউদের প্রতিদিন কয়েক কিলোমিটার দূরে যেতে হত। জলের অভাবে হত না চাষবাস। ফলে দারিদ্র্য ও অভাব ছিল এই গ্রামের নিত্যসঙ্গী। যাদের একটু পয়সা ছিল তারা অনেকেই এই গ্রাম ছেড়ে শহরে উদ্দেশ্যে পাড়ি জমান।

কিন্তু এত সহজে হাল ছাড়তে রাজি ছিলেন না লোঙ্গি ভুঁইয়া । গ্রামে জল আনতে তিনি একাই এগিয়ে আসেন। কাটতে শুরু করেন তিন কিলোমিটার লম্বা একটি খাল। প্রথমে গ্রামের আরও কয়েকজন তরুণকে তিনি খাল কাটার কথা বলেছিলেন। কিন্তু তাঁর সঙ্গে আর কেউই খাল কাটতে এগিয়ে আসেনি। সকলেই এটাকে বেগার খাটা বলে এড়িয়ে গিয়েছিলেন। এই অবস্থায় দীর্ঘ ৩০ বছর ধরে লোঙ্গি সকালে কিছু খাবার খেয়ে পোষ্য গরু-ছাগলগুলি নিয়ে বেরিয়ে পড়তেন।

অবশ্যই সঙ্গে থাকত কোদাল ও ঝুড়ি। এভাবেই দেখতে দেখতে চলে যায় ৩০ টা বছর। গ্রামের অনেকেই তাকে পাগল বলত। কেউবা বলত ভূতের বেগার খাটছেন লোঙ্গি। যদিও কোঠিওয়ালা গ্রামে জলের অভাবে চাষবাস প্রায় হত না বললেই চলে। তবে লোকে যে যাই বলুক, লোঙ্গি তাঁর লক্ষ্য থেকে সরে আসেননি। জঙ্গলে গিয়ে প্রথমে তাঁর পোষ্যগুলিকে ছেড়ে দিয়ে খাল কাটতে শুরু করতেন লোঙ্গি। এইভাবে দিনের পর দিন খাল কাটতে কাটতে গড়িয়ে যায় মাস, কেটে যায় বছর। দীর্ঘ ৩০ বছর পর হঠাৎই শেষ হয় খালকাটা। খালের মুখ জুড়ে যায় নদীর সঙ্গে।

লোঙ্গি জানিয়েছেন, বর্ষাকালে পর্যাপ্ত বৃষ্টি হলেও পাহাড় বা নদীতে থেকে গ্রামে জল আসার কোনও সুযোগ ছিল না। সে কারণেই তিনি এই খাল কাটার সিদ্ধান্ত নেন। খাল কাটার ফলে এখন পাহাড়ি নদী থেকে জল সরাসরি চলে আসছে কোঠিওয়ালা গ্রামে। তবে শুধু এই একটি গ্রাম নয়, লোঙ্গির এই খালের জলে উপকৃত হবেন আরও পাঁচটি গ্রামের মানুষ। এই পাঁচটি গ্রামের মাঠও হয়েছে শস্য-শ্যামল। যা দেখে এখন জুড়িয়ে যায় চোখ। শুধু চাষবাস নয়, গ্রামবাসীরা ওই খালে মাছ চাষ করতে পারবেন বলে দাবি করলেন ৭২ বছরের তরুণ লোঙ্গি। সামান্য একটা খাল গোটা গ্রামের দারিদ্র দূর দূর করবে বলে জানালেন এই বাহাত্তুরে তরুণ। লোঙ্গির কাটা এই খালে পাহাড় থেকে নেমে আসা বর্ষার জল যেমন গ্রামে ঢুকবে তেমনই পাহাড়ি নদীর জলও নিয়মিত আসবে।

লোঙ্গির এই অবদান স্বীকার করে নিয়েছেন বিনোদ ঝা নামে ওই গ্রামেরই এক ব্যক্তি। তিনি বলেছেন, দীর্ঘ ৩০ বছর ধরে লোঙ্গি একাই এই খাল কেটেছেন। জঙ্গলের মধ্যে লোঙ্গি দিনের পর দিন একা একা কী করছিলেন সেটা আমরা কেউই বুঝিনি। আজ বুঝতে পারছি লোঙ্গি কত বড় একটা কাজ করেছেন। তিন কিলোমিটার দীর্ঘ এই খাল কাটার ফলে আশপাশ এলাকার একাধিক গ্রামের সুবিধা হবে। চাষবাস করতে পারবে গ্রামের মানুষ।

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p style=”text-align: justify;”>সিং নামে ওই এলাকার এক শিক্ষক বলেছেন, এই খাল কাটার জন্য কোনও প্রশংসাই লোঙ্গির জন্য যথেষ্ট নয়। লোঙ্গির এই কাজে প্রচুর মানুষের উপকার হবে। ইতিমধ্যেই গোটা এলাকার চেহারা লোঙ্গি একার হাতেই পাল্টে দিয়েছেন। তাঁর এই অবদান এলাকার মানুষ কোনও দিন ভুলতে পারবে না।