SC से अरविंद केजरीवाल को बेल, दफ्तर जाने पर पाबंदी

नई दिल्ली:  शराब नीति मामले में सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार 13 सितंबर को दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की जमानत याचिका पर फैसला सुनाते हुए उन्हें बेल दे दी है। सुप्रीम कोर्ट ने शर्त के साथ केजरीवाल को जमानत दी है। इसके तहत अरविंद केजरीवाल अपने दफ्तर नहीं जा सकेंगे। इसी के साथ उन्हें ट्रायल के दौरान कोर्ट में पेश होना होगा। केजरीवाल सरकारी फाइलों पर दस्तखत भी नहीं कर सकते।

गौरतलब है कि सीबीआई द्वारा दर्ज भ्रष्टाचार के मामले में अपनी गिरफ्तारी और जमानत से इनकार किए जाने को चुनौती देते हुए अरविंद केजरीवाल ने दो अलग-अलग याचिकाएं दायर की थी। इसी पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया है।

दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल की जमानत पर वकील संजीव नासियार का कहना है, “सीबीआई मामले में जमानत मिल गई है। यह राहत का बड़ा दिन है। सीएम पिछले 5 महीने से जेल में बंद थे। जहां तक ​​गिरफ्तारी का सवाल है, दोनों न्यायाधीशों की राय अलग-अलग है। आदेश आने के बाद मैं इस पर टिप्पणी कर पाऊंगा। कुछ नियमित शर्तें हैं। वह संबंधित मामलों पर कोई सामान्य टिप्पणी नहीं कर पाएंगे। सीबीआई को क्योंकि मामला अदालत में विचाराधीन है। जब भी बुलाया जाएगा उन्हें अदालत में उपस्थित रहना होगा। हम जल्द ही उन्हें दिल्ली और फिर हरियाणा में देख सकेंगे।”

पीठ ने पांच सितंबर को न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइंया की बेंच ने केजरीवाल की याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित रख लिया था। सीबीआई ने इस मामले में आम आदमी पार्टी (आप) के संयोजक अरविंद केजरीवाल को 26 जून को गिरफ्तार किया था। उन्होंने दिल्ली हाई कोर्ट के 5 अगस्त के उस आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था, जिसमें हाई कोर्ट ने भ्रष्टाचार के इस मामले में उनकी गिरफ्तारी को बरकरार रखा था। हाई कोर्ट ने कहा था कि सीबीआई द्वारा केजरीवाल की गिरफ्तारी के बाद अब उनके खिलाफ पर्याप्त सबूत हैं और संबंधित साक्ष्यों को देखकर यह नहीं कहा जा सकता है कि गिरफ्तारी अकारण या अवैध थी। हाई कोर्ट ने उन्हें जमानत संबंधी याचिका पर निचली अदालत से संपर्क करने की भी अनुमति दी थी।

यह मामला दिल्ली सरकार की शराब नीति 2021-22 के निर्माण और क्रियान्वयन में कथित भ्रष्टाचार से जुड़ा है। इस नीति को बाद में निरस्त कर दिया गया था। ईडी ने कथित घोटाले के संबंध में मनी लॉन्ड्रिंग का एक अलग मामला दर्ज किया था। सीबीआई और ईडी के अनुसार, शराब नीति में संशोधन करके अनियमितताएं की गईं और लाइसेंसधारकों को अनुचित लाभ पहुंचाया गया।

शीर्ष अदालत ने 12 जुलाई को मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में केजरीवाल को अंतरिम जमानत दी थी। शीर्ष अदालत ने धनशोधन (रोकथाम) अधिनियम (पीएमएलए) के तहत ‘गिरफ्तारी की आवश्यकता और अनिवार्यता’ के पहलू पर तीन सवालों के संदर्भ में गहन विचार के लिए इसे एक बड़ी पीठ (पांच-सदस्यीय संविधान पीठ) को भेज दिया। ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में 21 मार्च को केजरीवाल को गिरफ्तार किया था।

भ्रष्टाचार मामले में अपनी याचिका पर 5 सितंबर को सुनवाई के दौरान अरविंद केजरीवाल ने सीबीआई की उस दलील का जोरदार विरोध किया था कि उन्हें जमानत के लिए सबसे पहले निचली अदालत जाना चाहिए। सीबीआई की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस. वी. राजू ने केजरीवाल की याचिकाओं के गुण-दोष पर सवाल करते हुए सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया था कि ईडी की गिरफ्तारी को चुनौती देने वाली याचिका के संबंध में भी शीर्ष अदालत को उन्हें (केजरीवाल को) निचली अदालत जाने के लिए कहना चाहिए।

संदीप घोष ने सुप्रीम कोर्ट में रखी अपनी याचिका

कोलकाता : आरजी कर मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल के पूर्व प्रिंसिपल संदीप घोष ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया हैं। इस याचिका में कहा गया है कि कलकत्ता हाई कोर्ट ने भ्रष्टाचार केस में जांच सीबीआई को सौंपने से पहले उनका पक्ष नहीं सुना। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि भ्रष्टाचार के मामले को अस्पताल में युवा डॉक्टर के दुष्कर्म और हत्या के साथ अनावश्यक रूप से जोड़ा गया है। सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर 6 सितंबर को सुनवाई कर सकता है।

गौरतलब है कि केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो के अधिकारियों ने सोमवार को संदीप घोष सहित चार आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया। मंगलवार अपराह्न यहां निजाम पैलेस स्थित सीबीआइ दफ्तर से डॉ संदीप घोष को जब बाहर लाया गया, तब उनके खिलाफ लोगों ने जमकर नारेबाजी की।

घोष को कड़ी सजा देने की मांग की गयी। कड़ी सुरक्षा के बीच घोष और अन्य आरोपियों को अलीपुर अदालत लाया गया, जहां अधिवक्ताओं के एक वर्ग ने भी घोष को लेकर नारेबाजी की। उनके समक्ष ‘चोर-चोर’ व ‘धिक्कार’ के नारे लगाये गये। इतना ही नहीं, अदालत से जब घोष को वापस सीबीआइ कार्यालय ले जाया जा रहा था, तभी अदालत परिसर में मौजूद लोगों की भीड़ में किसी शख्स ने उसे थप्पड़ जड़ दिया।

सिसोदिया की जमानत पर सुनवाई के दौरान जज ने खुद को केस से किया अलग

नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय कुमार ने मनीष सिसोदिया की उन याचिकाओं पर सुनवाई से खुद को अलग कर लिया जिनमें आबकारी नीति घोटाला मामलों में उनकी जमानत याचिकाओं पर नए सिरे से विचार करने का अनुरोध किया गया था। जमानत याचिकाओं पर नए सिरे से विचार करने संबंधी सिसोदिया की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के सुनवाई से खुद को अलग करने के बाद दूसरी पीठ 15 जुलाई को मामले की सुनवाई करेगी।

जैसे ही मामले की सुनवाई शुरू हुई जस्टिस संजीव खन्ना ने कहा, हमारे भाई को कुछ परेशानी है। वह व्यक्तिगत कारणों से इस मामले की सुनवाई नहीं करना चाहते। सिसोदिया की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक सिंघवी ने पीठ से मामले को तत्काल सूचीबद्ध करने का अनुरोध किया। उन्होंने कहा कि दोनों मामलों में अभी तक सुनवाई शुरू नहीं हुई है। पीठ ने कहा कि एक अन्य पीठ 15 जुलाई को इस मामले पर विचार करेगी।

सुप्रीम कोर्ट ने कथित शराब नीति घोटाले के संबंध में सीबीआई और ईडी द्वारा दर्ज मामलों में सिसोदिया की जमानत याचिका पर विचार करने से चार जून को इनकार कर दिया था। आप नेता सिसोदिया ने दिल्ली हाई कोर्ट के 21 मई के फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था, जिसमें उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी। सिसोदिया ने निचली अदालत के 30 अप्रैल के आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसे हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया था।

सीबीआई ने सिसोदिया को शराब नीति मामले में उनकी कथित भूमिका के लिए 26 फरवरी 2023 को गिरफ्तार किया था। ईडी ने उन्हें नौ मार्च 2023 को सीबीआई की प्राथमिकी पर आधारित धन शोधन मामले में गिरफ्तार किया था।

NEET मामले में NTA ने ग्रेस मार्क्स किया खत्म, दोबारा होगी 1563 छात्रों की परिक्षा

नई दिल्ली: नीट UG धांधली मामले में आज छात्रों की बड़ी जीत हुई है। सुप्रीम कोर्ट ने नीट परीक्षा परिणाम में अनियमितता को देखते हुए NTA को ग्रेस मार्क्स रद्द करके फिर से नीट एग्जाम आयोजित करने का निर्देश दिया है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की बेंच ने मामले की सुनवाई की।

67 छात्रों को 720 में से 720 मार्क्स मिलने पर जब NTA से सवाल पूछा गया था तो NTA इसके पीछे की वजह ग्रेस मार्क्स बताया था। NTA ने अपनी सफाई में कहा था कि कुछ एग्जाम सेंटर्स पर लॉस ऑफ टाइम की वजह से कुल 1563 छात्रों को ग्रेस मार्क्स दिए गए हैं जिसकी वजह से 44 छात्रों के मार्क्स 720 हुए। हालांकि आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के बाद NTA को ग्रेस मार्क्स रद्द करने का निर्देश दिया गया।

NEET रिजल्ट के बाद दाखिल की गई याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करते हुए कहा कि ग्रेस मार्क्स पाने वाले 1563 छात्रों का ही री-एग्जाम कराया जाएगा। इससे पहले एनटीए ने कहा था करीब 24 लाख छात्रों में से केवल 1563 छात्रों के परीक्षा परिणाम तक समस्या सीमित है। बाकी स्टूडेंट्स को कोई परेशानी नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने आज फिर दोहराया है कि NEET UG की काउंसलिंग पर कोई रोक नहीं लगाई जाएगी। स्टूडेंट्स काउंसलिंग राउंड में शामिल हो सकते हैं। 23 जून को दोबार नीट एग्जाम होगा और 30 जून को इसका रिजल्ट घोषित होने की उम्मीद है। ताकि जुलाई में नीट की काउंसलिंग शुरू हो सके। NTA की तरफ से कहा गया कि छात्रों का डर दूर करने के लिए यह निर्णय लिया जा रहा है। जिन स्टूडेंट्स को NTA की तरफ से ग्रेस मार्क्स दिए गिए हैं उनको एनटीए ने दो ऑप्शन दिए हैं। यह छात्र री-एग्जाम में बैठ सकते हैं या फिर अपने पुराने स्कोर के साथ ही काउंसलिंग की तरफ आगे बढ़ सकते हैं लेकिन उनके स्कोरकार्ड से ग्रेस मार्क्स हटा दिए जाएंगे। जिन कैंडिडेट को कॉन्फिडेंस है कि वे दोबारा परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन कर सकते हैं तो वे री-एग्जाम में शामिल होने का फैसला ले सकते हैं।

दरअसल, 5 मई को देशभर में हुई नीट परीक्षा कराने वाली NTA ने 4 जून को जब रिजल्ट जारी किया तो देश भर में हंगामा खड़ा हो गया। वजह 67 बच्चों को जहां 720 में 720 नंबर मिले थे, वहीं इससे भी ज्यादा 1563 बच्चों को ग्रेस मार्किंग दी गई थी। यह ग्रेस मार्किंग 10, 20 या 30 नंबर की नहीं 100 से 150 नंबर तक की दी गई थी, जिसकी वजह से कई बच्चे जो मेरिट में बाहर थे वो मेरिट में आ गए और जो मेरिट वाले बच्चे थे उनके लिए गवर्नमेंट कॉलेज में एडमिशन पाना मुश्किल हो गया।

Delhi Water Crisis पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, इमरजेंसी मीटिंग बुलाने का आदेश

नई दिल्ली : दिल्ली में भीषण गर्मी के बीच जल संकट बरकरार है. वहीं, इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सख्त आदेश दिए हैं. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अपर यमुना रीवर बोर्ड की एक आपात बैठक पांच जून को बुलायी जाए और समस्या का उचित तरीके से समाधान किया जाए. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि बैठक में केंद्र, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली के प्रतिनिधि शामिल होंगे. गौरतलब है कि इससे पहले दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल की सरकार की अतिरिक्त पानी की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की थी. इसी याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश दिया है.

अतिरिक्त पानी छोड़ने के लिए आवेदन

दिल्ली सरकार ने अपनी एक याचिका में सुप्रीम कोर्ट से अपील की है कि जल संकट से निपटने के लिए राष्ट्रीय राजधानी को हिमाचल प्रदेश द्वारा उपलब्ध कराया जाने वाला अतिरिक्त पानी छोड़े जाने का हरियाणा को निर्देश देने का अनुरोध है. बता दें, सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति जस्टिस पीके मिश्रा और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की अवकाशकालीन पीठ ने कहा कि केंद्र व दिल्ली, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश सरकार की ओर से पेश अधिवक्ताओं ने इस पर सहमति जतायी कि राष्ट्रीय राजधानी में पानी की कमी के मुद्दे से निपटने के लिए यूवाईआरबी की एक बैठक बुलाए. पीठ ने कहा कि सुनवाई के दौरान सभी पक्ष सहमत हुए कि दिल्ली के नागरिकों के समक्ष पानी की कमी की समस्या का ऐसा समाधान होना चाहिए जिसमें सभी पक्षों के अधिकतम हित पूरे होते हो.

अपर यमुना रीवर बोर्ड की एक आपात बैठक
इस याचिका में उठाए मुद्दों का समाधान करने के लिए पांच जून को अपर यमुना रीवर बोर्ड की एक आपात बैठक होनी चाहिए और सभी अन्य संबंधित मुद्दों को गंभीरता से लिया जाए ताकि दिल्ली के नागरिकों के लिए पानी की कमी की समस्या का उचित तरीके से समाधान किया जा सके. पीठ ने कहा कि इस मामले पर अगली सुनवाई छह जून को होगी जिसमें बोर्ड की बैठक और समस्या को हल करने के लिए पक्षकारों द्वारा उठाए सुझावात्मक कदमों पर जानकारी दी जाएगी.

दिल्ली की जल मंत्री आतिशी द्वारा दायर याचिका में केंद्र हरियाणा की भारतीय जनता पार्टी की सरकार और हिमाचल प्रदेश की कांग्रेस सरकार को पक्षकार बनाया गया है. इसमें कहा गया है कि जीवित रहने के लिए पानी तक पहुंच आवश्यक और बुनियादी मानवाधिकारों में से एक है. याचिका में हरियाणा सरकार को यह निर्देश देने का अनुरोध किया गया है कि वह वजीराबाद बैराज से तत्काल और निरंतर पानी छोड़े, जिसमें हिमाचल प्रदेश द्वारा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के लिए उपलब्ध कराए गए पूर्ण अधिशेष पानी को शामिल किया जाए ताकि राष्ट्रीय राजधानी में

Arvind Kejriwal: अरविंद केजरीवाल पर तल्ख टिप्पणी के बाद सुप्रीम कोर्ट में आज फिर सुनवाई

Arvind Kejriwal

सोमवार की सुनवाई के दौरान, अरविंद केजरीवाल (Arvind Kejriwal) के वकील ने अदालत से कहा कि किसी को केवल अपराध के सबूत पर गिरफ्तार किया जा सकता है, “केवल संदेह पर नहीं”।

नई दिल्ली: दिल्ली शराब नीति मामले में प्रवर्तन निदेशालय को बयान देने से इनकार करने के बावजूद अपनी गिरफ्तारी को चुनौती देने वाले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल (Arvind Kejriwal) पर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाए। मामले की सुनवाई कर रही दो-न्यायाधीश पीठ का हिस्सा रहे न्यायमूर्ति संजीव खन्ना ने कहा, “यदि आप धारा 50 के बयानों की रिकॉर्डिंग के लिए नहीं जाते हैं, तो आप यह बचाव नहीं कर सकते कि उनका बयान दर्ज नहीं किया गया था।”

पीएमएलए (धन शोधन निवारण अधिनियम) की धारा 50 ईडी अधिकारियों को समन जारी करने और दस्तावेज़, सबूत और अन्य सामग्री पेश करने की शक्ति से संबंधित है।

अपनी याचिका में, श्री केजरीवाल ने तर्क दिया है कि उनकी गिरफ्तारी अवैध है और उनकी हिरासत भी अवैध है। इसका मकसद राजनीतिक था, यह समय से स्पष्ट हो गया – आम चुनाव से पहले। उनकी याचिका में कहा गया, “यह प्रयास एक राजनीतिक दल को खत्म करने और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली की निर्वाचित सरकार को गिराने का है।”

सोमवार की सुनवाई के दौरान, उनके वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने अदालत से कहा कि किसी को केवल अपराध के सबूत पर ही गिरफ्तार किया जा सकता है, “केवल संदेह पर नहीं”। उन्होंने कहा था, ”यह धारा 45 पीएमएलए (मनी लॉन्ड्रिंग के खिलाफ कानून) की भी सीमा है,” उन्होंने कहा था कि जांच एजेंसी ने दिल्ली के मुख्यमंत्री के बयान को दोबारा दर्ज नहीं किया है।
“क्या आप यह कहकर खुद का खंडन नहीं कर रहे हैं कि धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) की धारा 50 के तहत उनके बयान दर्ज नहीं किए गए थे? आप धारा 50 के तहत बयान दर्ज करने के लिए समन पर उपस्थित नहीं होते हैं और फिर कहते हैं कि यह दर्ज नहीं किया गया था पीठ ने यह सवाल करते हुए कहा कि यदि श्री केजरीवाल बार-बार समन के बावजूद उपस्थित नहीं हुए तो जांच अधिकारी क्या कर सकते हैं।
श्री सिंघवी ने जवाब दिया था, “धारा 50 के बयानों को दर्ज न करना मुझे अपराध मानने के कारण गिरफ्तार करने का बचाव नहीं है।” “मैं कह रहा हूं कि अन्य सामग्री भी मेरे अपराध को स्थापित नहीं करती है। ईडी मुझे गिरफ्तार करने के लिए मेरे घर आई थी। फिर ईडी मेरे घर पर धारा 50 के तहत मेरा बयान क्यों दर्ज नहीं कर सकती?” उसने जोड़ा।
प्रवर्तन निदेशालय ने अदालत को दिए अपने हलफनामे में कहा था कि मुख्यमंत्री नौ बार पूछताछ के लिए समन में शामिल नहीं हुए हैं। “आज, आप यह नहीं कह सकते कि हम आपको गिरफ्तार कर लेंगे क्योंकि आप समन पर उपस्थित नहीं हुए। क्या आप कह सकते हैं कि चूंकि आपने सहयोग नहीं किया, इसलिए आपको गिरफ्तार कर लिया जाएगा? असहयोग अपराध का आधार या गिरफ्तारी का आधार नहीं हो सकता। यह अदालत पिछले साल कहा गया था कि असहयोग पीएमएलए के तहत गिरफ्तारी का आधार नहीं हो सकता,” श्री सिंघवी ने अदालत को बताया।
उन्होंने यह भी बताया कि पिछले साल 16 अप्रैल को केंद्रीय जांच ब्यूरो ने श्री केजरीवाल से पूछताछ की थी और उनके सभी सवालों के जवाब दिए थे।

प्रवर्तन निदेशालय ने तर्क दिया है कि श्री केजरीवाल पूछताछ से बच रहे थे और पीएमएलए की धारा 17 के तहत अपना बयान दर्ज करते समय, वह टालमटोल और असहयोग कर रहे थे। 21 मार्च को गिरफ्तार किए गए श्री केजरीवाल पूछताछ के लिए एजेंसी की हिरासत में थे। उन्हें 1 अप्रैल को न्यायिक हिरासत के तहत तिहाड़ जेल ले जाया गया था।
इस महीने की शुरुआत में, दिल्ली उच्च न्यायालय ने श्री केजरीवाल की गिरफ्तारी को बरकरार रखा था और कहा था कि बार-बार समन जारी नहीं करने के बाद प्रवर्तन निदेशालय के पास “थोड़ा विकल्प” बचा था।

सीबीआई ने तर्क दिया है कि शराब कंपनियां 2021-22 की दिल्ली उत्पाद शुल्क नीति को तैयार करने में शामिल थीं जिसे बाद में रद्द कर दिया गया था। यह नीति, जिससे उन्हें 12 प्रतिशत का लाभ मिलता, शराब लॉबी से रिश्वत प्राप्त करने के बाद तैयार की गई थी, जिसे “साउथ ग्रुप” कहा जाता था। प्रवर्तन निदेशालय ने आरोप लगाया कि रिश्वत का दुरुपयोग किया गया। सुनवाई मंगलवार को भी जारी रहेगी.

VVPAT: वीवीपैट पर सुप्रीम कोर्ट के 4 अहम सवाल, चुनाव आयोग को देना होगा जवाब

supreme court on VVPat

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट आज उन याचिकाओं पर अपना फैसला सुनाएगा जिसमें चुनाव के दौरान इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) के माध्यम से डाले गए वोटों के साथ वोटर-वेरिफिएबल पेपर ऑडिट ट्रेल वीवीपैट(VVPAT) पर्चियों का मिलान करने का निर्देश देने की मांग की गई है।
न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की पीठ ने आज सुबह भारतीय चुनाव आयोग (ईसीआई) के एक वरिष्ठ अधिकारी को कुछ सवालों के जवाब देने के लिए दोपहर 2 बजे अदालत में उपस्थित होने के लिए कहा।

1. कंट्रोलिंग यूनिट या वीवीपैट में माइक्रोकंट्रोलर लगा होता है?
2. माइक्रोकंट्रोलर एक बार प्रोग्राम करने योग्य है?
3. प्रतीक लोडिंग इकाइयाँ। चुनाव आयोग के पास कितने उपलब्ध हैं?
4. चुनाव याचिका दायर करने की सीमा अवधि आपके अनुसार 30 दिन है और इस प्रकार भंडारण और रिकॉर्ड 45 दिनों तक बनाए रखा जाता है। लेकिन लिमिटेशन डे 45 दिन है, आपको इसे सही करना होगा।

शीर्ष अदालत ने कहा, “हम बस कुछ स्पष्टीकरण चाहते थे, तथ्यात्मक रूप से हमें पेज पर होना चाहिए। कृपया दोपहर 2 बजे अधिकारी को फोन करें।”

पीठ अब दोपहर दो बजे बैठेगी.

पिछली सुनवाई में भी, पीठ ने ईवीएम की कार्यप्रणाली को समझने के लिए एक पोल पैनल अधिकारी से व्यापक बातचीत की थी।

चुनाव आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ वकील मनिंदर सिंह ने अदालत को बताया था कि ईवीएम स्टैंडअलोन मशीनें हैं और उनके साथ छेड़छाड़ नहीं की जा सकती, लेकिन मानवीय त्रुटि की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है।

इस बात पर जोर देते हुए कि चुनावी प्रक्रिया में पवित्रता होनी चाहिए, न्यायमूर्ति दत्ता ने श्री सिंह से कहा, “आपको अदालत में और अदालत के बाहर दोनों जगह आशंकाओं को दूर करना होगा। किसी को भी यह आशंका नहीं होनी चाहिए कि जो कुछ अपेक्षित है वह नहीं किया जा रहा है।”

चुनाव आयोग की दलीलों के बाद सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से कहा कि हर चीज पर अत्यधिक संदेह करना एक समस्या है।

पीठ ने एक के वकील से कहा, “हर चीज पर संदेह नहीं किया जा सकता। आप हर चीज की आलोचना नहीं कर सकते। अगर उन्होंने (ईसीआई ने) कुछ अच्छा किया है, तो आपको इसकी सराहना करनी होगी। आपको हर चीज की आलोचना नहीं करनी चाहिए।” याचिकाकर्ताओं.

16 अप्रैल को पहले की सुनवाई में, पीठ ने मैन्युअल गिनती प्रक्रिया के बारे में आपत्ति व्यक्त करते हुए कहा था कि भारत में चुनावी प्रक्रिया एक “बहुत बड़ा काम” है और “सिस्टम को ख़राब करने” का प्रयास नहीं किया जाना चाहिए।

वीवीपीएटी – वोटर वेरिफाइड पेपर ऑडिट ट्रेल – एक मतदाता को यह देखने में सक्षम बनाता है कि वोट ठीक से डाला गया था और उस उम्मीदवार को गया था जिसका वह समर्थन करता है। वीवीपीएटी एक कागज़ की पर्ची बनाता है जिसे एक सीलबंद कवर में रखा जाता है और कोई विवाद होने पर इसे खोला जा सकता है।

वर्तमान में, प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में पांच यादृच्छिक रूप से चयनित ईवीएम की वीवीपैट पर्चियों का सत्यापन किया जाता है।
वोटिंग की ईवीएम प्रणाली को लेकर विपक्ष के सवालों और आशंकाओं के बीच याचिकाओं में हर वोट के क्रॉस-सत्यापन की मांग की गई है।

याचिकाएं एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) और कार्यकर्ता अरुण कुमार अग्रवाल द्वारा दायर की गई हैं। श्री अग्रवाल ने सभी वीवीपैट पर्चियों की गिनती की मांग की है। एडीआर की याचिका में अदालत से चुनाव आयोग और केंद्र को यह सुनिश्चित करने का निर्देश देने की मांग की गई है कि मतदाता वीवीपैट के माध्यम से यह सत्यापित कर सकें कि उनका वोट “रिकॉर्ड के अनुसार गिना गया” है।

महुआ मोइत्रा को सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को लोकसभा से निष्कासन के खिलाफ टीएमसी नेता महुआ मोइत्रा की याचिका पर सुनवाई 3 जनवरी, 2024 के लिए स्थगित कर दी। लोकसभा से सांसद के रूप में उन्हें हटाने के प्रस्ताव के पक्ष में निचले सदन में मतदान के बाद शुक्रवार (8 दिसंबर) को उन्हें सदन से निष्कासित कर दिया गया। उनकी याचिका जस्टिस संजीव खन्ना और एसवीएन भट्टी की बेंच के सामने रखी गई। हालाँकि, सुनवाई के दौरान, न्यायमूर्ति खन्ना ने कहा कि उन्हें सुबह फ़ाइल मिली और इसे पढ़ने के लिए और समय चाहिए और इसलिए मामले को 3 जनवरी, 2024 को फिर से सूचीबद्ध करने के लिए कहा।तृणमूल कांग्रेस नेता महुआ मोइत्रा ने लोकसभा से अपने निष्कासन को चुनौती देने वाली याचिका दायर करने के कुछ दिनों बाद बुधवार को सुप्रीम कोर्ट से तत्काल सुनवाई की मांग की थी। वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने सुनवाई जल्द करने की मांग की थी। मोइत्रा ने अपने इस निष्कासन की तुलना ‘कंगारू अदालत’ द्वारा सजा दिए जाने से करते हुए आरोप लगाया कि सरकार लोकसभा की आचार समिति को विपक्ष को झुकने के लिए मजबूर करने का हथियार बना रही है। उन्होंने कहा कि एथिक्स कमेटी के पास निष्कासित करने का कोई अधिकार नहीं है…यह आपके (बीजेपी) अंत की शुरुआत है।

अनुच्छेद 370 सम्मान के लायक : चिदंबरम

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कांग्रेस ने सोमवार को जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 पर अपने फैसले पर सुप्रीम कोर्ट से असहमति जताते हुए कहा कि पूर्ववर्ती राज्य को विशेष दर्जा देने वाला कानून भारत के संविधान के अनुसार संशोधित होने तक सम्मान के योग्य है। वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम ने कहा कि उनकी पार्टी 2019 में भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार द्वारा अनुच्छेद 370 को रद्द करने के तरीके से सम्मानपूर्वक असहमत थी।चिदंबरम ने कहा कि हम इस बात से भी निराश हैं कि माननीय सुप्रीम कोर्ट ने राज्य को विभाजित करने और इसकी स्थिति को घटाकर 2 केंद्र शासित प्रदेशों तक सीमित करने के सवाल पर फैसला नहीं किया। उस सवाल को भविष्य में एक उपयुक्त मामले में निर्णय के लिए आरक्षित किया जा रहा है। हालाँकि, कांग्रेस ने जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा बहाल करने के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी की सराहना की।

उन्होंने कहा कि जिस तरीके से अनुच्छेद 370 को निरस्त किया गया, हम उस फैसले से सम्मानपूर्वक असहमत हैं। हम सीडब्ल्यूसी के संकल्प को दोहराते हैं कि अनुच्छेद 370 का तब तक सम्मान किया जाना चाहिए जब तक कि इसे भारत के संविधान के अनुसार सख्ती से संशोधित नहीं किया जाता।

देशहित में गहल फैसलों में सुधार जरुरी : अमित

Amit Shah

सोमवार को राज्यसभा में विचार और पारित होने के लिए जम्मू और कश्मीर आरक्षण (संशोधन) विधेयक, और जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक, 2023 पेश किए गए। विधेयक 6 दिसंबर को लोकसभा द्वारा पारित किए गए थे। चर्चा का जवाब देते हुए गृह मंत्री ने कहा कि यह एक महत्वपूर्ण दिन है क्योंकि ये दोनों विधेयक पारित हो जाएंगे और इसलिए भी क्योंकि यह जम्मू-कश्मीर और भारत के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में लिखा जाएगा। आज सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर (पुनर्गठन) विधेयक, 2019 के पीछे की मंशा, इसकी संवैधानिक वैधता और प्रक्रिया को बरकरार रखा। गृह मंत्री ने कहा कि परसों भी कई सवाल उठे थे। लोकसभा में कहा गया कि बिल लंबित है और इसे जल्दबाजी में लाया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट न्याय करेगा और हमें इसका इंतजार करना चाहिए। ये सभी स्टैंड न्याय के लिए नहीं बल्कि पीएम मोदी द्वारा लिए गए फैसलों को रोकने के लिए थे। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि देशहित में गहल फैसलों में सुधार जरुरी होता है।शाह ने कहा कि SC ने माना कि अनुच्छेद 370 एक अस्थायी प्रावधान था। यदि धारा 370 इतनी ही उचित, इतनी ही आवश्यक होती तो नेहरू जी उसके आगे अस्थायी शब्द का प्रयोग क्यों करते? जो लोग कहते हैं कि धारा 370 स्थायी है, वे संविधान सभा और संविधान की मंशा का अपमान कर रहे हैं।

महुआ मोइत्रा ने खटखटाया सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा

Mahua Moitra

कैश-फॉर-क्वेरी’ मामले में लोकसभा सांसद के रूप में निष्कासित किए जाने के कुछ दिनों बाद तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) नेता महुआ मोइत्रा ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। 8 दिसंबर को, सदन द्वारा अपनी आचार समिति की रिपोर्ट को अपनाने के बाद, मोइत्रा को लोकसभा से निष्कासित कर दिया गया था, जिसमें उन्हें अपने हित को आगे बढ़ाने के लिए व्यवसायी दर्शन हीरानंदानी से उपहार और अवैध संतुष्टि स्वीकार करने का दोषी ठहराया गया था। टीएमसी नेता ने आरोपों का जोरदार खंडन किया था। पश्चिम बंगाल में कृष्णानगर लोकसभा सीट का प्रतिनिधित्व करने वाली टीएमसी नेता ने कहा कि जब एथिक्स पैनल की रिपोर्ट पर विचार किया गया तो उन्हें सदन में अपना बचाव करने का मौका नहीं दिया गया।अपने निष्कासन के बाद, मोइत्रा ने “बिना सबूत के कार्य करने” के लिए नैतिकता पैनल पर हमला किया और कहा कि यह विपक्ष को “बुलडोज़र” देने का “हथियार” बन रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि आचार समिति और उसकी रिपोर्ट ने “पुस्तक के हर नियम को तोड़ दिया”।

एक करोड़ का जुर्माना पतंजलि को भ्रामक विज्ञापन पर सुप्रीम कोर्ट की फटकार

एलोपैथिक दवाओं को निशाना बनाकर भ्रामक विज्ञापन प्रकाशित करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को पतंजलि आयुर्वेद को कड़ी फटकार लगाई। जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने पतंजलि को चेतावनी दी कि अगर यह गलत दावा किया गया कि उसके उत्पाद कुछ बीमारियों को “ठीक” कर सकते हैं तो उस पर 1 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा। अदालत ने पतंजलि आयुर्वेद को निर्देश दिया कि वह भविष्य में ऐसे किसी भी भ्रामक विज्ञापन का प्रकाशन बंद करे। अदालत ने कहा कि पतंजलि को यह सुनिश्चित करना होगा कि वह प्रेस में आकस्मिक बयान देने से बचे।याचिका में आरोप लगाया गया है कि पतंजलि के भ्रामक विज्ञापन एलोपैथी को नीचा दिखाते हैं और कुछ बीमारियों के इलाज के बारे में झूठे दावे करते हैं। आईएमए ने आगे तर्क दिया कि पतंजलि के दावे असत्यापित हैं और ड्रग्स एंड अदर मैजिक रेमेडीज एक्ट, 1954 और उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 जैसे कानूनों का सीधा उल्लंघन हैं। अदालत ने यह निर्देश इंडियन मेडिकल एसोसिएशन द्वारा दायर एक याचिका पर विचार के दौरान दिया।

राज्यपाल ने सीएम को पत्र लिखकर वीसी की नियुक्ति चर्चा की मांग की है

कुलपति नियुक्ति पर घमासान के बीच राज्यपाल का मुख्यमंत्री को संदेश. सीवी आनंद बोस का मुख्यमंत्री ने पत्र लिखकर सभी विश्वविद्यालयों के वीसी नियुक्ति पर चर्चा की मांग। संयोग से, मुख्यमंत्री को राज्यपाल का पत्र सुप्रीम कोर्ट के ‘कॉफी टेबल पर बैठो’ संदेश के बाद आया है। कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम कुलपति की नियुक्ति को लेकर चल रहे विवाद को सुलझाने का आदेश दिया था. एक तरफ जहां राज्यपाल से कहा गया था कि वह किसी को अंतरिम कुलपति नियुक्त न करें, वहीं सुप्रीम कोर्ट ने सलाह दी है राज्य का प्रशासनिक मुख्यमंत्री कॉफ़ी टेबल पर चर्चा।

देश की सर्वोच्च अदालत के संदेश के कुछ दिन बाद राज्यपाल ने मुख्यमंत्री को पत्र भेजा. देखते हैं कि राज्यपाल की चिट्ठी पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की ओर से क्या जवाब आता है. इस बात पर भी गौर किया जा रहा है कि क्या भविष्य में कुलपति की नियुक्ति को लेकर चल रहे टकराव को सुलझाने के लिए कोई बैठक आयोजित की जाती है या नहीं। कुलपति की नियुक्ति से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के वकील ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि राज्यपाल सीवी आनंद बोस ने मामला लंबित रहते हुए भी 12 विश्वविद्यालयों के अंतरिम कुलपति की नियुक्ति कर दी है. ये सही नहीं है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी कर इस मामले पर सीवी आनंद बोस का बयान मांगा.

Nirbhaya: সুপ্রিম নির্দেশের পরেও অসম্পূর্ণ কাজ, হলফনামা জমা দিতে হবে রাজ্য সরকারকে

নির্ভয়া (Nirbhaya) কাণ্ডের পর সুপ্রিম কোর্টের নির্দেশে দেশের প্রতিটি মেট্রোশহরে মহিলাদের নিরাপত্তা সুনিশ্চিৎ করতে সিসিটিভি বসানোর নির্দেশ দিয়েছিলেন।সেই নির্দেশ মেনে কেন্দ্রীয় সরকার পশ্চিমবঙ্গের জন্য১৮১কোটি টাকা বরাদ্দ দেওয়া হয়। ২০১৯সাল থেকে আজও সম্পূর্ণ হয়নি বলে অভিযোগ।যা নিয়ে জনস্বার্থ মামলা দায়ের হয় হাইকোর্টে।

মঙ্গলবার মামলার শুনানিতেএডভোকেট জেনারেল সৌমেন্দ্র নাথ মুখোপাধ্যায় আদালতে জানান ইতিমধ্যে কলকাতায় ১০২০ টি সিসিটিভি ক্যামেরা লাগানো হয়েছে। বাকি ওয়ার্ক অর্ডার করা হয়েছে। এই বিষয়ে বিস্তারিত আদালতকে জানাবার জন্য হলফনামার সুযোগ দেওয়া হোক।

সিসিটিভি কেস :–

  • মামলাকারি পক্ষের আইনজীবী বিকাশ রঞ্জন ভট্টাচার্য্য প্রধান বিচারপতির ডিভিশন বেঞ্চে অভিযোগ করেন নির্ভয়ার ১৮১ কোটি টাকা তছরুপ হয়েছে।
  • প্রধান বিচারপতি প্রকাশ শ্রীবাস্তবের ডিভিশন বেঞ্চ নির্দেশ দেন আগামী ১৫ ফেব্রুয়ারির মধ্যে রাজ্য হলফনামা জমা দেবে।
  • পরবর্তী শুনানি ১৫ ফেব্রুয়ারি।

Delhi Pollution: দূষণের জন্য দায়ী পাকিস্তানকে দায়ী করল যোগী সরকার

Delhi Pollution

Kolkata24x7 Desk: দিল্লির বাতাস দূষণের জন্য আর কেউ নয় পাকিস্তান (pakistan) দায়ী, এমনটাই দাবি করল উত্তরপ্রদেশ সরকার (up government)। উত্তরপ্রদেশের বিজেপি সরকারের এই দাবিতে শীর্ষ আদালতে উপস্থিত অনেকেই হেসে ওঠেন।

শুক্রবার দিল্লি দূষণ (pollution in delhi ) নিয়ে সুপ্রিম কোর্টে (supreme court) শুনানি চলছিল। দিল্লির দূষণের জন্য কলকারখানা ও গাড়ি থেকে নির্গত ধোঁয়ার পাশাপাশি উত্তরপ্রদেশ, হরিয়ানা, পাঞ্জাবের মত রাজ্যে ফসলের গোড়া পোড়ানো অন্যতম কারণ হিসেবে উঠে এসেছে। সুপ্রিম কোর্টের প্রধান বিচারপতি এনভি রামান্নার বেঞ্চে দূষণ সংক্রান্ত মামলার শুনানি চলছে।

সেই শুনানিতেই শুক্রবার উত্তরপ্রদেশের আইনজীবী রঞ্জিত কুমার দাবি করেন, দিল্লির দূষণের জন্য উত্তরপ্রদেশকে কখনওই দায়ী করা যায় না। কারণ উত্তরপ্রদেশের প্রতিটি শিল্প-কলকারখানা পরিবেশ সংক্রান্ত বিধি মেনেই কাজ করে। তাই সেখান থেকে কোনও রকমভাবে দূষিত ধোঁয়া নির্গত হওয়ার প্রশ্নই ওঠে না। এরপরই রঞ্জিত কুমার আদালতকে স্তম্ভিত করে দিয়ে দাবি করেন, পাকিস্তান থেকে দূষিত বায়ু প্রবেশ করছে দিল্লিতে। সে কারণেই দিল্লির বাতাসে দূষণ বাড়ছে।

উত্তরপ্রদেশ সরকারের আইনজীবীর এই বক্তব্যে বিচারপতিরাও কিছুক্ষনের জন্যে চুপ করে যান। বিচারপতিরাও বুঝতে পারেননি, কীভাবে একজন আইনজীবী এই মন্তব্য করতে পারেন। এরপরই প্রধান বিচারপতি রামান্না উত্তরপ্রদেশের আইনজীবীকে ব্যঙ্গ করে বলেন, তাহলে আপনারা কি চান আমরা পাকিস্তানের শিল্প-কারখানাও নিষিদ্ধ করি। উত্তর প্রদেশ এবং দিল্লির মধ্যে কয়েক কিলোমিটারের ব্যবধান। তুলনায় পাকিস্তান ও দিল্লির মধ্যে ব্যবধানটা অনেক অনেক বেশি। তাহলে উত্তরপ্রদেশ থেকে যদি দূষিত বাতাস দিল্লিতে প্রবেশ করতে না পারে পাকিস্তান থেকে কিভাবে দূষিত বাতাস দিল্লিতে ঢুকছে?

রামান্না আরও বলেন, আসলে আপনারা কোনও চিন্তাভাবনা করে কথা বলেন না। একটি কথা বলার পর তার কি প্রতিক্রিয়া হতে পারে সেটা ভেবে দেখেন না। আপনার মনে যা এল সেটাই বলে দিলেন। এর চেয়ে হাস্যকর আর কিছু হতে পারে না।

উল্লেখ্য, এই মুহূর্তে গোটা বিশ্বের সবচেয়ে দূষিত শহরের তকমা পেয়েছে দিল্লি। সেই জায়গা থেকে বেরিয়ে আসতে সুপ্রিম কোর্ট সব ধরনের চেষ্টা চালাচ্ছে। কিন্তু সুপ্রিম কোর্ট নির্দেশ দিতে পারে মাত্র, তা বাস্তবায়িত করার কাজ রাজ্য সরকারের। সেই কাজে ইতিমধ্যেই দিল্লি সরকারের ভূমিকায় তীব্র অসন্তোষ প্রকাশ করেছে শীর্ষ আদালত। পাশাপাশি দিল্লি, পাঞ্জাব, হরিয়ানা, উত্তরপ্রদেশের মত রাজ্যগুলিকে দূষণ নিয়ন্ত্রণে একযোগে কাজ করার নির্দেশ দিয়েছে।

সুপ্রিম কোর্ট ও হাইকোর্টে শূন্যপদে দ্রুত বিচারপতি নিয়োগ করতে চায় কেন্দ্র, জানালেন আইনমন্ত্রী

Kiren Rijiju

Kolkata24x7 Desk: ভারতীয় বিচারব্যবস্থার (judicial system) দীর্ঘসূত্রতা সর্বজনবিদিত। বিচার ব্যবস্থার দীর্ঘসূত্রতার অন্যতম কারণ পর্যাপ্ত বিচারপতির (justice) অভাব। বেশিরভাগ হাইকোর্ট (high court) এবং সুপ্রিম কোর্টে (supreme court) পর্যাপ্ত বিচারপতি না থাকায় বিচার প্রক্রিয়া দীর্ঘায়িত হয়।

এ প্রসঙ্গটি আজ লোকসভায় উত্থাপন করেন তৃণমূল কংগ্রেস সাংসদ কল্যাণ বন্দ্যোপাধ্যায়। সাংসদ জানতে চান, বিভিন্ন রাজ্যের হাইকোর্ট ও সুপ্রিম কোর্টে ৪০৭ জনেরও বেশি বিচারপতির পদ শূন্য আছে। এর কারণ কী? বিভিন্ন রাজ্যের হাইকোর্টের ২৩৩ জন স্থায়ী বিচারপতি এবং ১৭৪ জন অতিরিক্ত বিচারপতি নিয়োগের সুপারিশ করেছে কলেজিয়াম। সেই সুপারিশ কি বাস্তবায়িত হয়েছে? যদি হয়ে থাকে তবে সরকার বিষয়টি বিস্তারিত জানাক।

কল্যাণ বন্দ্যোপাধ্যায়ের এই প্রশ্নের উত্তরে কেন্দ্রীয় আইন ও বিচার মন্ত্রী কিরেন রিজিজু জানান, চলতি বছরের ৩০ নভেম্বর পর্যন্ত সুপ্রিম কোর্টে একজন মাত্র বিচারপতির পদ ফাঁকা আছে। অন্যদিকে বিভিন্ন রাজ্যের হাইকোর্টে ৪০২ জন বিচারপতির পদ শূন্য রয়েছে। যার মধ্যে ১৬৪ জন বিচারপতি নিয়োগের প্রস্তাব কেন্দ্র ও কলেজিয়ামের মধ্যে আলোচনার বিভিন্ন পর্যায়ে রয়েছে। অন্যদিকে বিভিন্ন রাজ্যের হাইকোর্টের কলেজিয়াম থেকে ২৩৮ টি পদে নিয়োগের ব্যাপারে এখনও পর্যন্ত কোনও সুপারিশ এসে পৌঁছয়নি। সুপ্রিম কোর্টের কলেজিয়াম যে সমস্ত নাম সুপারিশ করেছে একমাত্র তাঁদেরই হাইকোর্টের বিচারপতি পদে নিয়োগ করা হয়েছে।

রিজিজু আরও বলেন, বিভিন্ন হাইকোর্টের বিচারপতি নিয়োগের ক্ষেত্রে সংশ্লিষ্ট হাইকোর্টের প্রধান বিচারপতি এবং অন্যান্য সিনিয়র বিচারপতিরা আলোচনা করেই চূড়ান্ত সিদ্ধান্ত নিয়ে থাকেন। শূন্যপদে তৈরির ছয় মাস আগেই তাঁরা এই নিয়োগের বিষয়টি চূড়ান্ত করেন। বিচারপতি নিয়োগের ক্ষেত্রে কেন্দ্র ও রাজ্য স্তরে সংশ্লিষ্ট বিভিন্ন সাংবিধানিক কর্তৃপক্ষের সঙ্গে আলোচনা করতে হয়। তবে সরকার চেষ্টা করছে, বিভিন্ন হাইকোর্ট এবং সুপ্রিম কোর্টের শূন্যপদের দ্রুত নিয়োগ করতে। বিভিন্ন বিচারপতির অবসর নেওয়া, বদলি হওয়া এবং পদোন্নতির হওয়ার কারণে বিভিন্ন হাইকোর্টের শূন্যপদ তৈরি হয় বলে রিজিজু জানান।

একই সঙ্গে তিনি বলেন, চলতি বছরের ৩০ নভেম্বর পর্যন্ত সুপ্রিম কোর্টের ৯ জন এবং বিভিন্ন হাইকোর্টের ১১৮ জন বিচারপতি নিয়োগের বিজ্ঞপ্তি জারি হয়েছে।

Delhi pollution: কেজরিওয়াল সরকারকে কড়া ভর্ৎসনা সুপ্রিম কোর্টের

Delhi pollution

News Desk, New Delhi:  দিল্লি  বাতাসের গুণমান (Delhi pollution) এখনও স্বাভাবিক হয়নি। বরং বাতাসে দূষণের পরিমাণ এখনও যথেষ্টই উদ্বেগজনক। এরইমধ্যে দিল্লিতে সমস্ত শিক্ষাপ্রতিষ্ঠান চালু করে দিয়েছে কেজরিওয়াল সরকার। ওই সিদ্ধান্তের বিষয়ে বৃহস্পতিবার সুপ্রিম কোর্ট কেজরি সরকারকে কড়া ভর্ৎসনা করল।

শীর্ষ আদালতের প্রধান বিচারপতি এনভি রামান্নার নেতৃত্বে গঠিত ডিভিশন বেঞ্চে দূষণ সংক্রান্ত একটি মামলার শুনানি চলছে। বৃহস্পতিবার শুনানি চলাকালে শীর্ষ আদালত কেজরি সরকারকে প্রশ্ন করে, আপনারা বলেছিলেন বাড়ি থেকেই অফিসের কাজকর্ম হবে। প্রতিশ্রুতি দিয়েছিলেন, স্কুল-কলেজ বন্ধ থাকবে। কিন্তু বাস্তবে তার কিছুই দেখা যাচ্ছে না। তাহলে আপনারা করছেনটা কী? একই সঙ্গে আদালত বলে, আপনারা তো প্রতিদিনই হলফনামা দিয়ে দূষণ রোধ করতে কত কিছু করবেন বলছেন। কমিটি তৈরি করছেন, কিন্তু তাতে কি আদৌ কি কোনও কাজের কাজ হয়েছে?

দিল্লি সরকারের তরফে আইনজীবী অভিষেক মনু সিংভি বলেন, দিল্লির সরকার রাজধানীর দূষণ প্রতিরোধ করতে বেশ কিছু ব্যবস্থা নিয়েছে। ওই উত্তরের প্রেক্ষিতে প্রধান বিচারপতি রামান্না ফের প্রশ্ন করেন, আপনি বলুন রাস্তার মাঝখানে ব্যানার নিয়ে কেন ছেলে মেয়েরা দাঁড়িয়ে আছে? এটাতো সস্তার রাজনীতি হচ্ছে। ছেলেমেয়েদের স্বাস্থ্যের বিষয়টা কি আদৌ ভাবা হচ্ছে? আদালত দিল্লির দূষণের সঙ্গে কোনও রকম আপস করবে না। কেউ যদি ভেবে থাকে আদালতের ঘাড়ে বন্দুক রেখে শিকার করবে, সেটা হবে না। আগে দিল্লি সরকার বলুক কোন পরিস্থিতিতে তারা স্কুল খোলার মত এত বড় একটা গুরুত্বপূর্ণ সিদ্ধান্ত নিল।

একই সঙ্গে এদিন শীর্ষ আদালতের বেঞ্চ দিল্লি সরকারকে জানিয়েছে, ২৪ ঘন্টার মধ্যে তাদের জানাতে হবে রাজধানীর দূষণ প্রতিরোধ করতে কী কী ব্যবস্থা নেওয়া হয়েছে।

Kangana Ranaut: সোশ্যাল মিডিয়ায় কঙ্গনার সমস্ত পোস্ট সেন্সর করার দাবিতে মামলা দায়ের

Kangana Ranaut

নিউজ ডেস্ক, মুম্বই: বলিউড অভিনেত্রী কঙ্গনা রানাউতের (Kangana Ranaut) সোশ্যাল মিডিয়ায় করা সমস্ত পোস্ট সেন্সর করা হোক। এমনই দাবি জানিয়ে সুপ্রিম কোর্টে (supreme court) একটি মামলা দায়ের হল। চরণজিৎ সিং চন্দ্রপাল (charanjit sing chandrapal) নামে এক ব্যক্তি শীর্ষ আদালতে এই মামলাটি দায়ের করেছেন। একই সঙ্গে কঙ্গনার এ ধরনের পোষ্ট নিয়ে দেশের স্বরাষ্ট্রমন্ত্রক (home ministry), তথ্যপ্রযুক্তি মন্ত্রক ও পুলিশের অবিলম্বে হস্তক্ষেপ দাবি করেছেন চরণজিৎ।

সম্প্রতি তিন কৃষি আইন, শাহরুখ পুত্র আরিয়ান খানের গ্রেফতারি নিয়ে একের পর এক পোস্ট করেছেন কঙ্গনা। সম্প্রতি কৃষি আইন বাতিলের সিদ্ধান্ত নিয়েও তিনি পোস্ট করেছেন। ইনস্টাগ্রামে কঙ্গনা যে সমস্ত মন্তব্য করেছেন তার বিরুদ্ধেই এই মামলাটি দায়ের হয়েছে। আবেদনকারী তাঁর আবেদনে বলেছেন, সোশ্যাল মিডিয়ায় সকলেরই বাক স্বাধীনতার অধিকার আছে এটা ঠিক।

কিন্তু কঙ্গনা সেই অধিকারের অপব্যবহার করছেন। তাই তাঁর বিরুদ্ধে অবশ্যই উপযুক্ত ব্যবস্থা নেওয়া দরকার। অভিনেত্রীর মন্তব্য উস্কানিমূলক। তাঁর এ ধরনের মন্তব্যে দেশের শান্তি বিঘ্নিত হতে পারে। একই সঙ্গে আদালতে তাঁর আবেদনে চরণজিৎ বলেছেন, এ ধরনের বিরূপ মন্তব্যের জন্য কঙ্গনার বিরুদ্ধে দেশের বিভিন্ন রাজ্যে একাধিক এফআইআর দায়ের হয়েছে। সেগুলি সব এক জায়গায় নিয়ে আসা দরকার।

চরণজিৎ তাঁর আবেদনে বলেছেন, সোশ্যাল মিডিয়ায় কঙ্গনা যে সমস্ত মন্তব্য করেছেন তা দেশের মধ্যে ঘৃণা ও বিদ্বেষের পরিবেশ তৈরি করছে। একজন সুপরিচিত অভিনেত্রী হিসেবে তাঁর অনেক দায়িত্বশীল হওয়া উচিত ছিল। কিন্তু দায়িত্বশীল হওয়া তো দূরের কথা, বরং তিনি বারেবারে দায়িত্বজ্ঞানহীনতার পরিচয় দিয়ে চলেছেন।

তবে সোশ্যাল মিডিয়া বা বাক-স্বাধীনতার অপব্যবহারের অভিযোগ কঙ্গনার বিরুদ্ধে নতুন নয়। আগেও তাঁর বিভিন্ন পোস্ট নিয়ে বিতর্ক তৈরি হয়েছে। ঘটনার জেরে ট্যুইটার তাঁকে ব্লক করে দিয়েছে। সর্বশেষ সংযোজন হিসেবে সোশ্যাল মিডিয়াতে কঙ্গনার সমস্ত পোস্ট সেন্সর করার দাবি উঠে গেল সুপ্রিম কোর্টে। এখন দেখার শীর্ষ আদালত এই আবেদনের প্রেক্ষিতে কী সিদ্ধান্ত নেয়।

Alapan Banerjee: আলাপন মামলায় হাইকোর্টের নির্দেশে রাজনীতির রং পেয়েছে নয়াদিল্লি

Alapan Banerjee

নিউজ ডেস্ক: আলাপন বন্দ্যোপাধ্যায়ের (Alapan Banerjee ) বদলির নির্দেশের বিরুদ্ধে সুপ্রিম কোর্টে যে মামলা চলছে তাতে কেন্দ্রের পক্ষ থেকে দাবি করা হল, কলকাতা হাইকোর্টের নির্দেশে রয়েছে রাজনৈতিক প্রভাব (political influence)। এদিন কেন্দ্রের পক্ষে সলিসিটর জেনারেল তুষার মেহতা (Tushar Mehota) এই মন্তব্য করেছেন।

উল্লেখ্য, সেন্ট্রাল অ্যাডমিনিস্ট্রেটিভ ট্রাইবুনাল আলাপন বন্দ্যোপাধ্যায়ের মামলাটি দিল্লির প্রিন্সিপাল বেঞ্চে (principle bench) সরিয়ে নিয়ে যাওয়ার নির্দেশ দিয়েছিল। কিন্তু কলকাতা হাইকোর্ট সেই নির্দেশ খারিজ করে দেয়। হাইকোর্টের নির্দেশকে চ্যালেঞ্জ জানিয়ে সুপ্রিম কোর্টে যায় কেন্দ্র। কেন্দ্রের পক্ষ থেকে আগেই শীর্ষ আদালতে কলকাতা হাইকোর্টের এক্তিয়ার নিয়ে প্রশ্ন তোলা হয়েছিল। সেই মামলার শুনানিতে মেহতা এদিন বলেন, আলাপন মামলায় হাইকোর্টের নির্দেশে রয়েছে রাজনীতির রং ও প্রভাব। এ ধরনের পর্যবেক্ষণ এড়িয়ে চলাই উচিত।

অন্যদিকে, আলাপন বন্দ্যোপাধ্যায়ের হয়ে এই মামলায় সওয়াল করেন প্রবীণ আইনজীবী অভিষেক মনু সিংভি। যদিও সুপ্রিম কোর্টের বিচারপতি এ এম খানউইলকর ও বিচারপতি সিটি রবিকুমারের ডিভিশন বেঞ্চ সোমবার এই মামলার রায় দান। স্থগিত রাখে।

উল্লেখ্য, আলাপন মামলা কেন দিল্লির প্রিন্সিপাল বেঞ্চে সরানো হল তা জানতে চেয়েছিল কলকাতা হাইকোর্ট। রাজ্যের বিষয় দিল্লিতে পাঠানোর জন্য আপত্তি জানিয়েছিল হাইকোর্টের ডিভিশন বেঞ্চ। এমনকি হাইকোর্ট এটাও বলেছিল যে, আলাপন প্রকৃত ন্যায় বিচার পাচ্ছেন না। তাই আলাপনের মামলা দিল্লিতে সরানো যাবে না। আলাপন মামলা সরানোর এই নির্দেশ যুক্তরাষ্ট্রীয় কাঠামোর পরিপন্থী।

হাইকোর্টের ওই পর্যবেক্ষণের উত্তরে সলিসিটর জেনারেল সর্বোচ্চ আদালতে বলেন, এখানে যুক্তরাষ্ট্রীয় কাঠামোর কথা কোথা থেকে আসছে? ক্যাটের চেয়ারম্যান শুধু মামলাটি এক বেঞ্চ থেকে থেকে অন্য বেঞ্চে স্থানান্তর করেছেন। হাইকোর্টের পর্যবেক্ষণে রয়েছে রাজনীতির রং। অন্যদিকে আলাপনের আইনজীবী সিংভি বলেন, কলকাতা হাইকোর্টের পর্যবেক্ষণ কাউকে আঘাত করেনি। আলাপন পশ্চিমবঙ্গ ক্যাডারের আইএএস অফিসার। তিনি বরাবরই কলকাতাতেই কাজ করেছেন। অবসর গ্রহণের পর তিনি কলকাতাতেই থাকছেন। তাই এই মামলা অবশ্যই কলকাতাতেই থাকা উচিত। উভয় পক্ষের আইনজীবীর বক্তব্য শোনার পর দুই সদস্যের ডিভিশন বেঞ্চ সোমবার আলাপন মামলার রায় দান স্থগিত রাখেন।

Delhi pollution: রাজধানীর বাতাসের গুণমান ফের নামল অতি খারাপ পর্যায়ে

Delhi pollution

Delhi  air quality is down to a very bad level
নিউজ ডেস্ক, নয়াদিল্লি: রাজধানীর দূষণ কমাতে একাধিক নির্দেশ দিয়েছে সুপ্রিম কোর্ট (supreme court)। সেই সমস্ত নির্দেশ মেনে একাধিক ব্যবস্থাও নিয়েছে দিল্লি সরকার (Delhi goverment)। কিন্তু তারপরেও দিল্লির দূষণকে (pollution) যেন কোনওভাবেই নিয়ন্ত্রণে আনা যাচ্ছে না। একাধিক বিধিনিষেধ মানার কারণে গত কয়েকদিন দিল্লি দূষণ সামান্য কমলেও বুধবার (wednesday) থেকে দূষণের মাত্রা উল্লেখযোগ্য হারে বেড়েছে। যে কারণে দিল্লির বাতাসের গুণমান ফের ‘অতি খারাপ’ পর্যায়ে পৌঁছেছে।

দূষণ কমাতে গত কয়েকদিন ধরেই দিল্লির সমস্ত স্কুল-কলেজ বন্ধ রয়েছে। যান চলাচলের উপর জারি করা হয়েছে একাধিক বিধি নিষেধ। এমনকী, দিল্লি ও সংলগ্ন এলাকার কয়েকটি জায়গায় জারি করা হয়েছে লকডাউন। এসবের জেরে রবিবার পর্যন্ত দিল্লির বাতাসের গুণমান কিছুটা ভালো হলেও ফের অবনতি হয়েছে।

বৃহস্পতিবার সকালে দিল্লির এয়ার কোয়ালিটি ইন্ডেক্স বা বাতাসের গুণমানের সূচক ফের ‘অতি খারাপ’ বিভাগে নেমে গিয়েছে। বাতাসে আপেক্ষিক আর্দ্রতা বেশি থাকার কারণে আগামী দুদিন দূষণের পরিমাণ একই থাকবে বলে জানানো হয়েছে।

বাতাসের গুণমানের বেশ কিছুটা উন্নতি হওয়ায় দিল্লিতে ফের নির্মাণকাজ শুরু হওয়ার কথা বলা হয়েছিল। কিন্তু সুপ্রিম কোর্টের নির্দেশে আপাতত আরও কয়েকদিন নির্মাণকাজ বন্ধ রাখতে হচ্ছে। পাশাপাশি দূষণ কমাতে যথাযথ ব্যবস্থা না নেওয়ায় সুপ্রিম কোর্ট আরোও একবার দিল্লি সরকারের কড়া সমালোচনা করেছে।